लोगो
प्रीलोडर आकृति

निदेशक का संदेश

निदेशक का संदेश

नमस्ते !

प्रो. (डॉ)  रंजन दास एमबीबीएस,  एमडी, पीजीसीएचएम, पीजीसीएचएफडब्ल्यूएम, सीसीएफई, एफआईपीएचए,  एफआईएपीएसएम

निदेशक, अखिल भारतीय स्वास्थ्य विज्ञान एवं जन स्वास्थ्य संस्थान कोलकाता,

प्रभारी अधिकारी, राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र  पश्चिम बंगाल,

निदेशक प्रोफेसर, पश्चिम बंगाल स्वास्थ्य विज्ञान विश्वविद्यालय (WBUHS), कोलकाता।

राष्ट्रीय विशेषज्ञ/सदस्य: चिकित्सा शिक्षा, महामारी की तैयारी, बीएसएल3  और बीएसएल 2 लैब्स, पीएम-एबीएचआईएम विस्तार, आईडीएसपी-आईएचआईपी 2.0, महामारी विज्ञान, सांख्यिकी और जैव-नैतिकता, राष्ट्रीय एकल स्वास्थ्य कार्यक्रम, राष्ट्रीय एंटी-माइक्रोबियल प्रतिरोध कार्यक्रम एनएपी 2.0, अंतर्राष्ट्रीय स्वास्थ्य नियम, जलवायु परिवर्तन और मानव स्वास्थ्य पर राष्ट्रीय कार्यक्रम, स्टेम सेल थेरेपी दिशानिर्देश फ्रेमिंग समिति, आदि।

राष्‍ट्रीय स्‍तर पर योगदान:पूर्व निदेशक – एनसीडीसी; उप महानिदेशक – चिकित्‍सा शिक्षा; निदेशक प्रोफेसर- लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज; पोर्ट स्‍वास्‍थ्‍य अधिकारी – कोलकाता पोर्ट्स; कार्यालय प्रमुख लैंड बॉर्डर स्‍वास्‍थ्‍य इकाई – पेट्रापोल (पश्चिम बंगाल) और अगरतल्‍ला (त्रिपुरा); निदेशक इंस्‍टीट्युट ऑफ सेरोलॉजी कोलकाता; सहायक कंट्रोलर एवं प्रभारी परीक्षा – राष्‍ट्रीय परीक्षा बोर्ड; चिकित्‍सा, दंत, नर्सिंग, फार्मेसी; एवं एलाइड हेल्‍थ काउंसिल; कॉलेज रेकग्निसन निरीक्षण हेतु एमसीआई/ एनएमसी समन्‍वयकर्ता; एएमयु अलीगढ़ में, पीजीआईएमएस रोहतक में; एसएमसी गाजियाबाद में, एम एल एन एम सी प्रयागराज में संकाय के रूप में; केयर इंडिया; लखनऊ, उत्‍तर प्रदेश इत्‍यादि स्‍थानों पर राज्‍य समन्‍वयकर्त्‍ता के रूप में रहा।

अंतरराष्‍ट्रीय स्‍तर पर योगदान:BRICS, QUAD, G20, ASEAN, इत्‍यादि के लिए इंडियन हेल्थ डेलीगेशन को लीड किया और यूके, रूस, सिंगापुर, नीदरलैंड, डेनमार्क आदि के साथ द्विपक्षीय स्वास्थ्य संवाद किए। 

आदरणीय महानुभाव / प्रिय साथियो,

नमस्ते!

अखिल भारतीय स्‍वास्‍थ्‍य विज्ञान एवं जन स्वास्थ्य संस्थान ( एआईआई एच एवं पी एच), कोलकाता के 27वें निदेशक के रूप में कार्य करना मेरे लिए सम्मान के साथ – साथ एक गंभीर दायित्‍व भी है । यह एक प्रतिष्ठित राष्ट्रीय संस्‍थान है, जिसकी गौरवशाली विरासत साढ़े नौ दशकों से भी अधिक पुरानी है। अपनी स्थापना के समय से ही इस संस्थान को स्वच्छता एवं जन स्वास्थ्य के क्षेत्र में शिक्षण, प्रशिक्षण और अनुसंधान का दायित्व सौंपा गया है।

रॉकफेलर फाउंडेशन के सहयोग से वर्ष 1932 में स्थापित अखिल भारतीय स्‍वास्‍थ्‍य विज्ञान एवं जन स्वास्थ्य संस्‍थान (एआईआई एच एवं पी एच), की परिकल्पना जॉन्स हॉपकिन्स तथा लंदन स्कूल ऑफ हाइजीन एंड ट्रॉपिकल मेडिसिन जैसे संस्थानों की परंपरा में एक वैश्विक उत्कृष्टता केंद्र के रूप में की गई थी। दक्षिण एशिया के इस प्रथम जन स्वास्थ्य संस्थान के अधिदेश में अपने ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रीय अभ्यास क्षेत्रों में सहयोग एवं परामर्श प्रदान करना तथा स्वास्थ्य सेवाओं का वितरण करना भी शामिल था। साथ ही, भारत सरकार को नीति-निर्माण, प्रशासनिक व्यवस्था एवं क्षेत्रीय स्तर पर कार्यान्वयन में सहायता प्रदान करना भी इसके प्रमुख उद्देश्यों में सम्मिलित था। इसकी उत्पत्ति का इतिहास वर्ष 1863 से जुड़ा हुआ है, जब भारत में सेना की स्वच्छता संबंधी स्थिति पर गठित रॉयल कमीशन ने पहली बार देश में औपचारिक जन स्वास्थ्य शिक्षा के विकास की अनुशंसा की थी, ताकि महंगे विदेशी डिप्लोमा एवं प्रशिक्षण पर निर्भरता को कम किया जा सके।

मुझे यह बताते हुए अत्यंत हर्ष हो रहा है कि पिछले 95 वर्षों के दौरान संस्थान  ने भारत में जन स्वास्थ्य शिक्षा के क्षेत्र में निरंतर अग्रणी भूमिका निभाई है। संस्थान ने वर्ष 1932 में देश का प्रथम जन स्वास्थ्य डिप्लोमा प्रारंभ किया। इसके बाद वर्ष 1933 में मातृ एवं शिशु कल्याण डिप्लोमा, वर्ष 1948 में पर्यावरण एवं जन स्वास्थ्य में स्नातकोत्तर उपाधि , वर्ष 1949 में आहार विज्ञान डिप्‍लोमा, वर्ष 1951 में औद्योगिक स्वच्छता डिप्लोमा, वर्ष 1958 में डॉक्टरेट कार्यक्रम, वर्ष 1966 में स्वास्थ्य शिक्षा डिप्लोमा, वर्ष 1970 में पशु चिकित्सा जन स्वास्थ्य में स्नातकोत्तर उपाधि तथा वर्ष 1975 में जन स्वास्थ्य नर्सिंग डिप्लोमा सहित अनेक महत्वपूर्ण शैक्षणिक कार्यक्रम प्रारंभ किए गए। आज संस्थान द्वारा नियमित शैक्षणिक कार्यक्रमों के अंतर्गत कुल तेरह पाठ्यक्रम संचालित किए जा रहे हैं, जिनमें राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग  द्वारा मान्यता प्राप्त एम.डी. पाठ्यक्रम, अनेक स्नातकोत्तर कार्यक्रम तथा औद्योगिक स्वास्थ्य में एसोसिएट फेलोशिप शामिल हैं। इनके अतिरिक्त, संस्थान द्वारा कई विशिष्ट अल्पकालिक प्रशिक्षण कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं। साथ ही, कुछ अन्य पाठ्यक्रम एवं प्रशिक्षण कार्यक्रम भी विकास के उन्नत चरणों में हैं।

वर्ष 1939 में स्थापित संस्थान की सिंगूर स्थित ग्रामीण स्वास्थ्य इकाई एवं प्रशिक्षण केंद्र ने अपने ऐतिहासिक “थ्री मिलियन स्टडी” के माध्यम से भारत के समुदाय आधारित प्राथमिक स्‍वास्‍थ्‍य सेवा मॉडल का मार्ग प्रशस्‍त किया। इस अध्‍ययन के निष्‍कर्षों का उल्‍लेख स्वास्थ्य सर्वेक्षण एवं विकास समिति (भोर समिति -1943–46) द्वारा किया गया तथा इन निष्कर्षों ने वर्ष 1978 में विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा घोषित “वर्ष 2000 तक सभी के लिए स्वास्थ्य” की संकल्पना को आकार देने में भी योगदान दिया। स्वच्छता, पेयजल, मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य, पोषण, महामारी विज्ञान तथा रोग नियंत्रण के क्षेत्र में संस्थान द्वारा किए गए प्रारंभिक कार्य आज भी राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रासंगिक बने हुए हैं। वर्ष 1944 में अखिल भारतीय स्‍वास्‍थ्‍य विज्ञान एवं जन स्‍वास्‍थ्‍य संस्‍थान  ने भारत का प्रथम ब्लड बैंक (रक्त बैंक) भी स्थापित किया, जो जन स्वास्थ्य के क्षेत्र में नवाचार, अनुसंधान एवं नीति निर्माण में संस्थान के दीर्घकालीन योगदान को प्रतिबिंबित करता है।

यह भी हर्ष का विषय है कि संस्थान ने वर्तमान आवश्यकताओं के अनुरूप अपने दायित्‍व का निरंतर विस्तार किया है और आज इसके कार्यक्षेत्र में जन स्वास्थ्य आपात स्थितियों से निपटने की तैयारी, रोगों की प्रारंभिक चेतावनी एवं निगरानी, उन्नत निदान एवं त्वरित प्रतिक्रिया, सांख्यिकीय विश्लेषण, कार्यान्वयन अनुसंधान, जलवायु एवं स्वास्थ्य तथा अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य सहित अनेक अन्य क्षेत्र शामिल हैं। विशेष रूप से, संस्थान ने एच आई वी सीरो-निगरानी , आर्सेनिकोसिस, स्ट्रीट फूड हाइजिन, जरवा जनजाति की पोषण स्थिति आदि  क्षेत्रों में अग्रणी कार्य किया है। इसके अतिरिक्त, संस्थान ने निपाह, एवियन इन्फ्लुएंजा, स्क्रब टाइफस, एपिडेमिक ड्रॉप्सी, हैजा, एल टॉर, मलेरिया आदि रोगों के प्रकोप की जाँच, निदान तथा त्वरित प्रतिक्रिया के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया है। आज का आधुनिक अखिल भारतीय स्‍वास्‍थ्‍य विज्ञान एवं जन स्‍वास्‍थ्‍य संस्‍थान स्वास्थ्य सेवाओं की आपूर्ति के लिए ड्रोन के उपयोग, जलवायु-संबंधी औद्योगिक स्वास्थ्य के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता एवं डिजिटल ट्विन प्रौद्योगिकी तथा सामुदायिक स्वास्थ्य सेवाओं और दक्षता आधारित चिकित्‍सा शिक्षा के लिए डिजिटल उपकरणों के उपयोग के क्षेत्र में भी नवाचार कर रहा है। इनमें से अंतिम दो पहल, यदि पायलट परियोजना के दौरान सफल पाई जाती हैं, तो उनमें पेटेंट प्राप्त करने तथा राष्ट्रीय स्तर पर कार्यान्वयन की पर्याप्त संभावनाएँ हैं।

अंतर्विषयक एवं अनुवादात्‍मक अनुसंधान के माध्यम से उत्कृष्टता को बढ़ावा देने के लिए आधुनिक अखिल भारतीय स्‍वास्‍थ्‍य विज्ञान एवं जन स्‍वास्‍थ्‍य संस्‍थान, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के विभिन्न संगठनों, जैसे राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र, भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद, आपदा प्रबंधन प्रकोष्ठ आदि के साथ निकटता से कार्य करता है। इसके अतिरिक्त, संस्थान होम्योपैथिक शिक्षा बोर्ड, अंतरराष्ट्रीय विकास एजेंसियों जैसे विश्व स्वास्थ्य संगठन, यूनिसेफ, रोग नियंत्रण एवं रोकथाम केंद्र आदि, तथा राष्ट्रीय महत्व के संस्थानों जैसे (एआई आई एम एस, पीजीआईएमईआर, एएफएमसी आदि) के साथ भी सहयोग करता है। इनके साथ-साथ, संस्थान स्वास्थ्य क्षेत्र से इतर संस्थानों, जैसे आईआईटी खड़गपुर, IISWBM कोलकाता, IVRI बरेली आदि, राज्य/केंद्र शासित प्रदेशों के स्वास्थ्य प्राधिकरणों तथा अनेक अन्य सहयोगी संस्थाओं के साथ भी कार्य करता है। उपरोक्त सिद्धांत के अनुरूप, अखिल भारतीय स्‍वास्‍थ्‍य विज्ञान एवं जन स्‍वास्‍थ्‍य संस्‍थान  पश्चिम बंगाल के राज्य स्वास्थ्य प्राधिकरणों के साथ भी सहयोग कर रहा है, ताकि राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र की पश्चिम बंगाल शाखा को सुदृढ़ किया जा सके। इसके अंतर्गत उसकी क्षेत्रीय एवं प्रयोगशाला क्षमताओं को मजबूत करना, राज्य स्वास्थ्य अधिकारियों के लिए एक वर्षीय अभिनव इंटरमीडिएट फील्ड एपिडेमियोलॉजी प्रशिक्षण कार्यक्रम, राज्य जन स्वास्थ्य पर्यवेक्षण दलों की स्‍थापना सुदृढ़ीकरण तथा एकीकृत रोग निगरानी कार्यक्रम के एकीकृत स्वास्थ्य सूचना मंच  के माध्यम से रोगों के प्रकोप की बेहतर पहचान एवं उनके पूर्वानुमान की संभावनाओं को बढ़ाना शामिल है।

मुझे यह साझा करते हुए भी अत्यंत हर्ष हो रहा है कि अखिल भारतीय स्‍वास्‍थ्‍य विज्ञान एवं जन स्‍वास्‍थ्‍य संस्‍थान के चार पूर्व संकाय सदस्यों/निदेशकों/पूर्व छात्रों को राष्ट्रीय जन स्वास्थ्य के क्षेत्र में उनके उत्कृष्ट वैज्ञानिक योगदान के लिए अत्यंत प्रतिष्ठित पद्म भूषण/पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया है: 

1) प्रो.के.सी.के.ई. राजा- महामारी विज्ञान एवं जीवन-सांख्यिकी विभाग के प्रमुख तथा भोर समिति के सदस्य-सचिव - पद्म भूषण (1936)।  2) प्रो.पी.वी. सुखात्मे — सांख्यिकी विभाग के विभागाध्यक्ष — पद्मश्री (1971)।

3) प्रो.इंदिरा चक्रवर्ती — निदेशक तथा जैव रसायन एवं पोषण विभाग की विभागाध्यक्ष — पद्मश्री (2014) एवं 4) प्रो.महेंद्र पाल — एम वी पी एच  पाठ्यक्रम के पूर्व छात्र — पद्मश्री (2023)।

संस्थान के भावी मार्ग के संदर्भ में यह दृढ़ता से महसूस किया जाता है कि तीन प्रमुख विचारणीय बिंदु अत्यंत महत्वपूर्ण होंगे। प्रथम, जन स्वास्थ्य का दायरा और उससे जुड़ी चुनौतियाँ निरंतर तेजी से बढ़ रही हैं, जिसके लिए नई विशेषज्ञताओं एवं उप-विशेषज्ञताओं के विकास के साथ-साथ उन्हें समर्थन प्रदान करने वाली शिक्षा, अनुसंधान एवं प्रशिक्षण की भी आवश्यकता है। द्वितीय, इन चुनौतियों का सामना करने के लिए सम्पूर्ण समाज एवं सम्पूर्ण सरकार के दृष्टिकोण को अपनाना आवश्यक होगा, ताकि अनुसंधान एवं नवाचार के लाभ शीघ्रता से समुदायों तक पहुँच सकें और वैश्विक स्तर पर प्रसारित होने से पहले सर्वप्रथम देश को लाभान्वित कर सकें। तृतीय, चूँकि अखिल भारतीय स्‍वास्‍थ्‍य विज्ञान एवं जन स्‍वास्‍थ्‍य संस्‍थान वर्ष 2032 में अपनी शताब्दी वर्षगाँठ के निकट पहुँच रहा है, इसलिए संस्थान को अगले शतक में भी देश तथा व्यापक वैश्विक समुदाय के लिए प्रासंगिक बने रहने हेतु एक स्पष्ट रोडमैप (कार्ययोजना) तैयार करना होगा।

उपर्युक्त तीनों वास्तविकताएँ अखिल भारतीय स्‍वास्‍थ्‍य विज्ञान एवं जन स्‍वास्‍थ्‍य संस्‍थान के लिए ‘उत्कृष्टता के एक केंद्र’ के रूप में कार्य करने से आगे बढ़कर ‘उत्कृष्टता के नेटवर्क’  के निर्माण की दिशा में विकसित होने की आवश्यकता को रेखांकित करती हैं। इसके लिए अंतर्विषयक एवं अनुवादात्‍मक अनुसंधान, प्रौद्योगिकी सक्षम नवाचार तथा सामाजिक रूप से प्रासंगिक अनुसंधान और मापनीय एवं व्‍यापक स्‍तर पर लागू किए जा सकने वाले प्रभाव पर केंद्रित मजबूत राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों को बढ़ावा देना आवश्यक होगा। इसी दिशा में, संस्थान निम्नलिखित क्षेत्रों में ‘’राष्‍ट्रीय क्षेत्रीय उत्‍कृष्‍टता केंद्र’’ स्थापित करने की संभावनाओं का पता लगा सकता है—जन स्वास्थ्य सूक्ष्म जीव विज्ञान, BSL-3 सुविधाएँ, प्राथमिकता वाले उष्णकटिबंधीय रोग एवं सर्पदंश विषाक्तता, जन स्वास्थ्य संग्रहालय, जन स्वास्थ्य एवं संबद्ध विज्ञान विश्वविद्यालय तथा जन स्वास्थ्य नर्सिंग शिक्षा एवं अनुसंधान। इसके साथ ही, आपदा प्रबंधन, अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य, एकल स्वास्‍थ्‍य, जलवायु एवं स्वास्थ्य, जीआईएस एवं कृत्रिम बुद्धिमत्ता, स्वास्थ्य अर्थशास्त्र, स्वास्थ्य नीति, सामाजिक एवं व्यवहार विज्ञान, पॉइंट ऑफ केयर डायग्‍नॉस्टिक्स आदि क्षेत्रों के लिए विशिष्‍ट विभागों एवं इकाईयों की स्‍थापना पर भी विचार किया जा सकता है।

संस्थान में उपलब्ध मानव संसाधनों की सीमाओं को देखते हुए, इन महत्वाकांक्षी लक्ष्यों को केवल अखिल भारतीय स्‍वास्‍थ्‍य विज्ञान एवं जन स्‍वास्‍थ्‍य संस्‍थान द्वारा अकेले प्राप्त करने के बजाय ‘जन स्वास्थ्य संस्थानों के एक संघ के माध्यम से साकार करना अधिक उपयुक्त हो सकता है। इस संघ में AIIH&PH, NCDC, NIHFW, NIPHTR, NHSRC तथा अन्य राष्ट्रीय एवं राज्य स्तरीय संस्थानों को शामिल किया जा सकता है। यह दृष्टिकोण जून 2023 में भारत मंडपम में माननीय प्रधानमंत्री द्वारा केंद्रीय प्रशिक्षण संस्थानों के बीच अधिकाधिक कंसोर्टियम (संघ) विकसित करने के आह्वान के अनुरूप भी होगा।

मुझे विश्वास है कि अखिल भारतीय स्‍वास्‍थ्‍य विज्ञान एवं जन स्‍वास्‍थ्‍य संस्‍थान के संकाय सदस्यों, शोधकर्ताओं, विद्यार्थियों, कर्मचारियों, सहयोगी संस्थानों एवं हितधारकों की सामूहिक प्रतिबद्धता से संस्थान अपने कंसोर्टियम सहयोगी संस्थानों के साथ मिलकर स्वच्छता, जन स्वास्थ्य एवं संबद्ध विज्ञानों के क्षेत्र में एक सशक्त एवं जीवंत वैश्विक उत्कृष्टता केंद्र के रूप में विकसित हो सकता है। इस प्रकार, संस्थान अपनी ऐतिहासिक परिकल्पना एवं विरासत को आगे बढ़ाते हुए भारत की महामारी तैयारी, राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य सुरक्षा तथा ‘विकसित भारत@2047’ के राष्ट्रीय दृष्टिकोण में महत्वपूर्ण योगदान दे सकेगा।

अंत में, अधोहस्ताक्षरी इस संस्थान को गौरवशाली बनाने वाले पूर्व एवं वर्तमान संकाय सदस्यों, कर्मचारियों, विद्यार्थियों, सहयोगी संस्थानों तथा क्रमिक रूप से कार्यरत सभी निदेशकों के प्रति विनम्रतापूर्वक अपनी हार्दिक कृतज्ञता एवं आभार व्यक्त करते  हैं । मैं स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार के निरंतर सहयोग एवं मार्गदर्शन के लिए भी अत्यंत आभारी हूँ। मैं इस गौरवशाली विरासत को नवीन उद्देश्य, नवाचार, समर्पण एवं त्‍वरित कार्रवाई की भावना के साथ आगे बढ़ाने के लिए पूर्णतः प्रतिबद्ध हूँ।

धन्यवाद।

सादर,

जय हिंद ! वंदे मातरम !!